शनिवार, अगस्त 12, 2017

छेड़छाड़ से छेड़छाड़- ये तो ठीक बात नहीं है जी...


हम हिन्दुतानी अति ज्ञानी...जिसकी भद्द न उतार दें बस कम जानिये.
साधारण सा शब्द है खाना’...संज्ञा के हिसाब से देखो तो भोजन और क्रिया के हिसाब से देखो तो भोजन करना...मगर इस शब्द की किस किस तरह भद्द उतारी गई है जैसे कि माथा खाना, रुपया खाना, लातें खाना से लेकर अपने मूँह की खाना तक सब इसी में शामिल हो गया.
ऐसे में जब आजकल की गर्मागरम चर्चा छेड़छाड़ पर बात चली तो इसके भी अजीबो गरीब इस्तेमाल देखने को मिले.
छेड़छाड़ यूँ तो अनादि काल से हमारी संस्कृति का हिस्सा रही है. कृष्ण जी की रासलीला, गोपियों के संग छेड़छाड़  के प्रसंग हम भक्ति भाव से हमेशा ही पढ़ते और सुनते आए हैं. सहेलियों में आपस में छेड़छाड़ से लेकर जीजा साली की छेड़छाड़ हमेशा ही एक स्वस्थ एवं सुखद मनोरंजन का साधन होते हैं. इससे रिश्तो में एक प्रगाढ़ता और अपनेपन का एहसास पैदा होता है.
कभी प्रेमिका की लटों से हवा की छेड़छाड़ पर पूरे के पूरे गीत लिखे और गाये जाते थे.
फिर वक्त के साथ साथ बदलती मानसिकता के चलते छेड़छाड़ शब्द सुनते ही ख्याल आता था कि जरुर किसी लड़के ने लड़की के साथ छेड़छाड़ की होगी. मगर फिर अति ज्ञान का सागर कुछ ऐसा बहा कि छेड़छाड़ से ही बहुत छेड़छाड़ कर गया मानो हाल ही मुंबई में एक आम आदमी द्वारा पुलिस वाले को कई थप्पड़ मारे गये जैसी कोई घटना हो. जिस शब्द का काम ही छेड़छाड़ दर्शाना था, उसी से छेड़छाड़ हो गई.
कायदे से यह शब्द सबसे ज्यादा लड़कियों द्वारा अपने उपर हो रही छींटाकसी को बताने के लिए होना चाहिये था कि फलाने लड़के ने मेरे साथ छेड़छाड़ की मगर देखने में आ रहा है कि लड़कियाँ तो आज के जमाने की अपने उपर हो रही छेड़छाड़ से खुद ही निपटने में सक्षम हो ली हैं और यह शब्द उनसे ज्यादा दूसरों के काम आ रहा है. न न!! आप यह न समझे कि अब लड़के इसे अपने आपको लड़कियों के द्वारा छेड़े जाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.
दरअसल नेतागण इसका इस्तेमाल अपने ओहदे के मद में आकर अपने द्वारा दिये गये ऊलजलूल बयानों से, जब बात का बतंगड़ बन जाता है, तब बचाव करने के लिए करते नित नजर आते हैं. हर उल्टे सीधे बयान से बचने के लिए उनके पास सबसे मुफीद उपाय होता है कि एक और बयान दे डालें कि मीडिया ने मेरे बयान के साथ छेड़छाड़ कर उसे तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया है.
हालात तो ये हैं कि जब इन नेताओं का आम छेड़छाड़ की चरम का एमएमएस बन कर आम जनता के बीच सेक्स सीडी के रुप में आ जाता है तब भी यह ललकारते हुए कहते हैं कि सीडी से छेड़छाड़ की गई है. यह डॉक्टर्ड है. इन्हीं लोगों से मुझे यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि छेड़छाड़ को अंग्रेजी में डाक्टर्ड भी कहते हैं.
ऐसे ऐसे नेता जो आम जनता को भड़काते नहीं थकते थे कि जब कोई रिश्वत मांगे तो मना मत करना, दे देना जी और उसकी रिकार्डिंग करके हमें भिजवा देना, हम उसको तुरंत जेल भिजवायेंगे, उन्हीं के लोग जब खुद रिश्वत लेते हुए या सौदेबाजी करते हुए रिकार्ड हो जाते हैं तो कहते हैं कि यह रिकार्डिंग गलत है और इससे छेड़छाड़ की गई है.
कभी तथ्यों से, तो कभी बयानों से, तो कभी मंत्री के लड़के के द्वारा लड़की को छेडे जाने वाले सीसीटीवी के फुटेज से छेड़छाड़ का सिलसिला इतना बढ़ गया है कि छेड़छाड़ शब्द खुद ही यह भूल गया है कि वो दरअसल किसी लड़के द्वारा किसी लड़की को छेडे  जाने के लिए बना था.
यूं भी आजकल ऐसी छेड़छाड़ का जमाना भी नहीं रहा जिसमें राह चलते किसी लड़की को कोई लड़का कुछ बोल बाल कर छेड़छाड़ कर दे. जहाँ से खबर आती है सीधे रेप की ही आती है..छेड़छाड़ वाली बातें अब नहीं होतीं. छेड़छाड़ की रिपोर्ट अगर पुलिस में लिखवाने जाओ तो लगेगा कि जैसे ऎके ४७ के जमाने में देशी तमंचे से कहीं पर आतंकवादी हमला हो गया हो और उसकी रिपोर्ट लिखी जा रही हो.
बदले जमाने में अब छेड़छाड़ की रिपोर्ट लिखवाने के लिए थाने नहीं जाना पड़ता, पुलिस खुद तलाश में रहती है कि एंटी रोमियो कानून में किसी घटना को कैसे छेड़छाड़ का नाम देकर बुक कर लिया जाये ताकि साहेब को एक आंकड़ा दिया जा सके कि इतनी छेड़छाड़ की घटनायें रोक दीं. छेड़छाड़ का केस दर्ज करने के लिए आवश्यक सामग्री एक लड़का और एक लड़की का साथ में मिल जाना बस पूरे केस को मुकम्मल कर देता है फिर लड़की लाख दुहाई दे कि मैं तो इसकी बहन हूँ और इसके साथ बाजार जा रही थी.
छेड़छाड़ के खिलाफ लाये गये एंटी रोमियो एक्ट से साथ पुलिस और एंटी रोमियो स्काव्यड ने जिस तरह से छेड़छाड़ की है कि छेड़छाड़ भी शर्मिंदा होकर कह रही है कि अब बस भी करो कितनी छेड़छाड़ करोगे मेरे साथ?
-समीर लाल समीर
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के अगस्त १३, २०१७ में प्रकाशित

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शनिवार, अगस्त 05, 2017

अफवाह उड़ाओ तो ऐसी कि पकड़ न आये

अपने दिल की किसी हसरत का पता देते हैं
मेरे बारे में जो अफवाह उड़ा देते हैं...
कृष्ण बिहारी नूर को यह शेर कहते सुनता हूँ, तो मन में ख्याल आता है कि अफवाह वह अनोखा सच है जो तब तक सच रहता है जब तक झूठ न साबित हो जाये. जब से यह विचार मन में आया है तब से एकाएक दार्शनिक सा हो जाने की सी फीलिंग आने लग गई है. लगता है कि हम कोई बाबा से हो गये हैं और खूब सारी जनता हमें बैठ कर सुन रही है. अब जनता तो कहाँ से लाते तो लिख दे रहे हैं यह मानते हुए कि खूब सारे लोग पढ़ेंगे और हमारे कहे का लोहा मानेंगे.
बस यही सुनने वाले जब कहने वाले की बात का लोहा मानने लगते हैं तो वो कहने वाला ऐसी अफवाह उड़ाने की मान्यता प्राप्त कर लेता है जो इतनी दूर तक फैल जाती है कि उसको समेटते समेटते ही इतना वक्त लग जाता है कि उसके झूठ साबित होने का जब तक समय आये, तब तक दो और नई अफवाहें हवा में तैरने लगती हैं. ऐसा ही लोहा मनवा कर मीडिया और नेता दोनों अपना उल्लु सीधा करने के लिए नित नई अफवाह उड़ा देते हैं और आमजन उसी में उलझे अपनी जिन्दगी बसर करता रहता हैं. पता ही नहीं चल पाता कि क्या सच है और क्या झूठ है?
वैसे एक अचूक तरीका, जनहित में बताता चलूँ..जैसे बाबा लोग सलाह देते हैं वैसा ही..जब कभी आपको यह जानना हो कि बात अफवाह है या सच तो बस इतना ख्याल रखें..जो उड़ रही हो वो अफवाह और जो अपरिवर्तित थमा हो वह सत्य..कहते हैं न कि अफवाह उड़ा दी है और यह भी कि सत्य अटल है. हमें हिंट ही तो देना था बाकी तो आप ज्ञानी हैं ही अतः इस हिंट के आधार पर भेद कर ही लेंगे...जब हिंट के आधार पर जीवन जीने की कला सीख लेते है श्री श्री से आर्ट ऑफ लिविंग में तो यह तो कुछ भी नहीं.
कई बार तो क्या, अक्सर पता भी होता है कि बात झूठ है मगर जैसा कहा गया है एक ही झूठ को बार बार बोला जाये और जोर जोर से बोला जाये तो वह सच लगने लगता है. उसी का सब फायदा उठाये चले जा रहे हैं.
कुछ इसी तरह के उदाहरण देखता हूं जैसे कि एक अफवाह है कि नोट बन्दी से सारे भारत की जनता खुश है..देखिये सब हमको ही वोट दिये जा रहे हैं और कह रहे हैं कि आपने ठीक किया. अब इसमें सच क्या तलाशें? वाकई वोट दिया लोगों ने कि इवीएम वाली अफवाह सच है..या नोटबन्दी से जनता खुश है और सारा काला धन वापस आ गया और वो भी इत्ता सारा कि ९ महिने गुजरने को हैं और अभी तक नोटों की गिनती चलती ही जा रही है. इसमें नोट गिनने की मशीनों से लेकर ब्रान्च से मुख्य बैंक तक रकम भेजे जाने की एकाउन्टिंग पर प्रश्न चिन्ह लगने के बावजूद... इस अफवाह पर मुहर लगाने वाला भी सबसे बड़े बैंक का प्रमुख ही है..अगर वही अफवाह उड़ायेगा तो सच कौन बतलायेगा की तर्ज पर इस अफवाह को भी झूठ साबित करने का मन ही नहीं करता.
अब एक अफवाह हाल में यूं उड़ रही कि कोई चोटीकटवा है जो महिलाओं की चोटी काट कर ले जाता है.अव्वल तो अब पुरुष चोटी रखते नहीं तो चोटीकटवा की मजबूरी है कि महिलाओं की चोटी काटे..अतः इसे महिलाओं पर हमला नहीं मानना चाहिये..कि उन्हें कमजोर समझा गया...यह मात्र चोटी पर हमला है..उस पर से महिलायें भी ज्यादती करती हैं....शहर में अक्सर चोटी रखने से गुरेज करने लगी हैं तो बिहार के गाँवों की महिलाओं पर चोटीकटवा का कहर जायज ही है..जहाँ चोटी मिलेगी वहीं न जायेगा..इसमें दलित महिलाओं पर हमले वाली बात कहाँ से आ गई? हालांकि वो चोटी काट क्यूँ रहा है..इससे किसी को कुछ लेना देना दिख नहीं रहा है..बस, आज यहाँ कहर..कल वहाँ कहर ..दलित महिला पर कहर पर बहस जारी है!!
खैर..बहुत हल्ला हो लिया इस अफवाह का भी..कल परसों तो कोई नई अफवाह लाना प़ड़ेगी वरना यह झूठ न साबित हो जाये...
अफवाह का विलुप्त हो जाना ही उसकी खूबी है..जो अफवाह झूठ साबित हो जाये वो अफवाह उड़ाने वाले की नाकामी है...न कि अफवाह की.
पहले अपने अंदर वो काबिलियत पैदा करो कि अफवाह उड़ाओ तो ऐसी उड़े कि पकड़ न आये वरना कृप्या इस खेल से बाहर रहो...
इतना तो होश रखो...कि कहीं तुम्हारे कारण अफवाह अपनी उड़ान न रोक दे किसी रोज!!

-समीर लाल समीर
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार ६ अगस्त के अंक में:
http://epaper.subahsavere.news/c/21130031

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रविवार, जुलाई 30, 2017

गठबंधन का तो स्वभाव ही खुलना और बँधना है...

ये बंधन तो प्यार का बंधन है, जन्मों का संगम है
यह गीत के बोल हैं करण अर्जुन फिल्म के जो इस वक्त कार में रेडिओ पर बज रहा है.
सोचता हूँ कि कितने ही सारे बंधन हैं इस जीवन में. विवाह का बंधन है पत्नी के साथ. प्यार भी ढेर सारा और कितना ही टुनक पुनक हो ले, लौट कर शाम को घर ही जाना होता है और फिर जिन्दगी उसी ढर्रे पर हंसते गाते चलती रहती है . गाने की पंक्ति बज रही है... विश्वास की डोर है ऐसी, अपनों को खीच लाती है. विवाह का बंधन इतना तगड़ा होता है कि फेवीकोल वाले भी इसे अपने इस्तेहार में जोड़ की ताकत दिखाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. रिटर्न गिफ्ट में शादी डाट कॉम वाले फेवीकोल से मजबूत रिश्तों की दुहाई देते हैं.
रिश्तों के बंधन है. कर्तव्यों और दायित्वों को निभाने का बंधन है. समाज के बंधन हैं जो आपको गलत कार्य करने से रोकते हैं वरना समाज को क्या मूँह दिखायेंगे वाले. 
मित्रता के बंधन हैं. अपने वचनों और वादों को निभाने का बंधन है. मगर ये बंधन भी उन्हीं के लिए हैं जो इन्हें माने. वरना तो इन बंधनों की हालत भी गाँधी जी के समान ही हो ली है. जो इन्हें मान्यता देता है वह राष्ट्रपिता कह कर भारत की आजादी में उनके योगदान और अहिंसा को नमन करके श्रृद्धावनत हो जाता है, वहीं न मानने वाले कहते हैं कि गाँधी न होते तो आज भारत की तस्वीर दूसरी होती. भारत का कभी बटवारा न होता. नेहरु प्रधानमंत्री न होते बल्कि पटेल होते ..आज भारत जो २०१४ के बाद से बनना शुरु हुआ है वो १९४७ से बन रहा होता. ये दूसरी बात है कि क्या बन रहा है वो दिखता तो इतने सालों में भी नहीं, यह तय है.
ठीक ऐसे ही इन बंधनों से मुक्त संपूर्ण नेताओं की जमात है, जैसे आर टी आई से लेकर तमाम कानून, परोक्ष या अपरोक्ष, मगर इन पर लागू नहीं होते हैं.
वादों को जुमलों का नाम देकर उसके बंधन से मुक्त होना भी इसी मुक्ति मार्ग का नया प्रचलन है मगर मुक्त तो ये सर्वदा से थे ही.
इस जमात में जो सबसे प्रचलित बंधन है उसे गठबंधन का नाम दिया गया है. नाम किसने दिया है यह तो नहीं मालूम मगर संधि विच्छेद विशेषज्ञ इसे गांठ वाला बंधन बताते हैं. सुविधानुसार जब मरजी हुई और जिससे सत्ता में काबिज होने का अरमान पूरा होता दिखा, उससे गांठ बांध ली. हो गया गठबंधन और बन गये सत्ताधीष. जब लगा कि अब सामने वाली की अपेक्षायें बढ़ती जा रही हैं और उसे पूरा करना संभव न हो पायेगा तो गाँठ खोल कर दूसरे को लुभा लाये और उससे गठबंधन कर लिया और पहले वाले से खत्म. मुद्दा सत्ता बनी रही...गाँठ का तो स्वभाव ही खुलना और बँधना है, इसमें ये बेचारे क्या करें.
जैसा कि पहले ही बता दिया गया है ये जमात समस्त बंधनों से मुक्त है अतः इन्हें न तो जनमत के बंधन से कुछ लेना देना है और न ही किस मूँह से वापस उसी जनता के बीच वापस जायेंगे, वाली शरम के बंधन से कुछ लेना देना है.
कुछ रोज पहले जिसको सामने तो क्या, पोस्टर पर देखना भी मंजूर न था. जिसे सुबह शाम धोखेबाज करार दे रहे थे, आज एकाएक उसी से गाँठ बाँध ली. बस किसी भी तरह, सत्ता पर काबिज रहें.
कभी कभी लगता है कि जनता के बदले तोते से पर्चियाँ निकलवा कर प्रत्याशी चुन लिया जाना चाहिये और फिर गठबंधन गठबंधन खेल कर सरकार बना ली जाना चाहिये. जब जनता की मरजी का कुछ होना ही नहीं है तो उनका समय, चुनाव की तामझाम, लुभावने वादों से नाहक सपनों के संसार की उम्मीदें, बेइंतहा पैसा आदि व्यर्थ क्यूँ गंवाना? न ईवीएम में गड़बड़ी का चार्ज लगेगा, न घपलेबाजी का और न ही हैकाथन करवाने की झंझट मोल लेना पड़ेगी..
हम तो सिर्फ उपाय ही बता सकते हैं भलाई के लिए अतः बता दिया. करना धरना तो उन्हीं को है मगर हमारे बताये उपाय और उनकी अब तक की जुगत (वे इसे चाणक्य निती पुकारते हैं) देख कर मन में एक संशय जाग उठा है कि अगर तोते ट्रेन्ड करके ले आये तब तो बस उन्हीं की पर्चियाँ खींचेगा...और विपक्षी चीखेंगे कि तोताथन करवाओ जी..सब के सब तोते भी इनसे मिले हुए हैं...
तब पहली बार तोता और नेता का गठबंधन यह विश्व देखेगा...
विश्वगुरु यूँ ही थोड़े न कहलायेंगे.
-समीर लाल ’समीर’
    
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार ३० जुलाई के अंक में:

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शनिवार, जुलाई 22, 2017

मर्यादाएं तोड़ना अक्सर तबाही की ओर ले जाता है..


भरपूर बारिश का इन्तजार किसान से लेकर हर इंसान और प्रकृति के हर प्राणी को रहता है. भरपूर बारिश शुभ संकेत होती है  इस बात का कि खेती अच्छी होगी, हरियाली रहेगी, नदियों, तालाबों, कुओं में पानी होगा. सब तरफ खुशहाली होगी. लेकिन जब यही बारिश भरपूर की मर्यादा  तोड़ बेइंतहा का दामन  थाम कर  बाढ़ की शक्ल अख्तियार कर लेती है, तब वह अपने साथ तबाही का मंजर लाती है.
मर्यादाएं तोड़ना अक्सर तबाही की ओर ले जाता है.
इसीलिए कहते हैं ना अति बरखा  ना अति  धूप - अति सर्वत्र वर्जिते!
बाढ़ से जहां एक ओर खेती नष्ट होती है. वहीं दूसरी तरफ जान माल की भी बहुत हानि होती है इसे प्रकृति का प्रकोप माना जाता है.
ऐसा नहीं की बाढ़ सिर्फ पानी  की होती है. जहां कहीं मर्यादाएं   लाँधी जाती है.. किसी बात की अति कर दी जाती है, तब वह बाढ़ का ही स्वरुप मानी जाती है और एक तबाही का मंजर पैदा करती है. हमारे देश में समय समय पर कभी धरनों की बाढ़,  कभी आंदोलनों की बाढ़, कभी पुरस्कार वापसी की  बाढ़, कभी देशद्रोह की बाढ़ और भी न जाने कैसी कैसी बाढ़ें देखने में आती है.. अंततः देखा यही गया है कि सभी  तबाही की ओर एक नया कदम होते हैं.
पिछले दशक में इंटरनेट, फेसबुक, ब्लॉग, व्हाटसएप आदि नें  संपादकों द्वारा  साहित्य में निर्धारित मानकों  की मर्यादाओं को तोड़ते हुए सीधे लिखने वाले के हाथ में छापने की बागडोर  सौंप दी.. तब देखिए  नए-नए कहानीकारों और कवियों की ऐसी बाढ़ आई कि जो भी  टाइप करना सीख गया, वह कवि और कहानीकार हो गया. अगड़म बगड़म चार पंक्तियां लिखी और उसे नव कविता का नाम दें   फेसबुक पर छाप  खुद को  नामचीन  कवि मान बैठे. इस जमात की बाढ़ ने कविता और साहित्य की दुनिया में कैसी तबाही मचाई है, यह किसी से छुपी नहीं है. पानी की बाढ़ की तबाही से  तो खैर देश  जल्द ही उबर आता है.. लेकिन साहित्य  और कविताओं की इस तबाही से  उबरने में साहित्यजगत को सदियाँ लग जाएंगे मगर  दर्ज यह मंजर फिर भी रहेंगे.
इसी कड़ी में हाल ही में व्यंग्यकारों की  भी एकाएक बाढ़ सी आ गई है और जल्द ही व्यंग्य के क्षेत्र में भी तबाही का मंजर देखने में आएगा. व्यंग्य के स्थापित मठाधीशों को तो नजर आने भी लगा है. मैं खुद भी अपनी तरफ से इस तबाही के हवन में कुछ  दो  चार  आहूतियां डालते चल रहा  हूं ताकि इतिहास बनाने में पीछे न छूट जाऊँ. कविता और कहानी के क्षेत्र में भी मेरी आहूतियां की अहम भूमिका को इनकी तबाही का इतिहास हमेशा याद  करेगा.
कुछ बरस पहले भ्रष्टाचार की बाढ़ का मंजर सब ने देखा.  भ्रष्टाचार  की अति  ने सदियों से जमीं कांग्रेस पार्टी को ऐसा नेस्तनाबूद और तबाह किया कि अब  चंद गिनती के  सिपाही इसे जिंदा रखने के लिए सीपीआर देने में जुटे हैं और इसकी सांस है कि लौटकर आने का नाम ही नहीं लेती.
इधर कुछ वर्षों में मोदी-मोदी के समर्थन की भी बाढ़ सी आई हुई है.  बाढ़ तो क्या कहें इसे, सुनामी कहना ही ज्यादा मुफीद होगा.  जैसे सुनामी के बाद जहां देखो, सब कुछ जलमग्न दिखाई देता है.. एक आध  टापू नुमा  कुछ अगर बचा भी रह जाए तो इस अताह जलराशि के समुंदर में वो कहीं अपनी कोई अहमियत नहीं रखता और देखते देखते एक दिन  हिम्मत हार कर वह भी उसी समंदर में डुबकी लगा लेता है. वही हाल पूरे हिंदुस्तान  ने इस सरकार को समर्थन देकर सब कुछ मोदीमय एवं मोदीमग्न कर दिया है.
लोकसभा के बाद  सबसे बड़े प्रदेश, उत्तर प्रदेश में पुनः  वही सुनामी ऐसा हाहाकार मचा कर उठी कि गोवा और उत्तराखंड जैसे प्रदेश जहां बाढ़  न भी आई थी, वह भी टापू मानिंद सुनामी की हाहाकार में मोदी रुपी समुंदर में डुबकी लगा कर बैठ गए. फिर तो चाहे दिल्ली महानगरपालिका हो या लेफ्टिनेंट गवर्नर या राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव.. हर तरफ समर्थन की वही बयार..
मैं नहीं कहता  कि हम किसी तबाही की ओर  अग्रसर है और न ही  मुझे देश के कोने कोने से प्राप्त, भले ही कोई इसे ईवीएम की  घपलेबाजी माने  या झूठे वादों और  प्रलोभनों का असर, समर्थन से कोई एतराज है.. बस बाढ़ का स्वभाव जानता  हूँ और  सुनामी का तांडव देख चुका हूं  तो मन घबरा सा जाता है..
घबराए मन की व्यथा लिख दी है ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आवे..
-समीर लालसमीर

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के जुलाई २३, २०१७ के अंक में प्रकाशित
http://epaper.subahsavere.news/c/20762304

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बुधवार, जुलाई 19, 2017

पानी केरा बुदबुलदा, अस मानस की जात



कम्प्यूटर पर उपल्ब्ध अनगिनित खेलों में से एक है – बर्स्ट द बबल.
इस खेल में कम्प्यूटर स्क्रीन के अलग अलग कोने में कहीं से भी एक बबल (बुलबुला - बुदबुदा) उठता है और आपको अपने कर्सर से नियंत्रित सुई को उस बबल पर ले जाकर उसे फोड़ना होता है. अगर आप निर्धारित समय में निशाना साध कर बबल न फोड़ पाये तो बबल चंद सेकेंडों के लिए इधर उधर उड़ते हुए अन्नत में कहीं खो जाता है और दूसरा बबल दूसरी जगह उभर कर आ जाता है.
बबल फोड़ लेने पर आपको एक पाईंट मिलता है और न फोड़ पाने पर कम्प्यूटर को एक. आप बस कभी यहाँ कभी वहाँ बबल का पीछा करते हुए इस खेल में ऐसा उलझ जाते हैं कि आपके जीवन में मानो बबल फोड़ लेना ही एक मात्र समस्या हो..ऐसे में बाकी दिन भर की परेशानियाँ और जिन्दगी की समस्यायें बाजू में खड़ी मूँह बाये आपकी नजरे इनायत का इन्तजार करती हैं.
इसी वजह से इस खेल को स्ट्रेस बस्टर केटेगरी में रेड कार्पेट गेम ऑफ द गेम्स के अवार्ड से नवाजा गया है.
निश्चित ही कम्प्यूटर खेल खिला रहा है तो जीतना भी उसी का तय है मगर बस आप निराश न हों और जीत की आशा कायम रहे इस हेतु बीच बीच में आपको एक दो बबल फोड़ने भी देता है और आपके खेलने का उत्साह देखते हुए एक दो बार आपको जिता भी देता है...जैसे हम अपने बच्चों को दौड़ना सिखाते हुए कई बार बहाने से हांफते हुए उन्हें रेस में जीत जाने देते हैं और बच्चा खुशी के मारे चिल्लाते हुए आत्म विश्वास से भर जाता है कि मैने पापा को हरा दिया...मम्मी भी उसका कंधा थपथपाती है..ओह मेरे बेटे, पापा को हरा दिया..मेरा बेटा सुपर मैन हैं. बच्चे को छोड़ सब जानते हैं कि यह उसके आत्मविश्वास के खोखले गुब्बारे में भरी जा रही वो हवा है जिससे वह अपने आने जीवन को जी जाने को उत्साहित होता है.
इधर जबसे इस खेल को जाना, खेला और सोचा तो समझ आया कि..ये बबल और कुछ नहीं..कभी अच्छे दिन, कभी काला धन, कभी नोटबन्दी, कभी भगवा ब्रिगेड, कभी घर वापसी, कभी रोमियो एक्ट, कभी मंदिर मस्जिद, कभी पशुरक्षक, कभी आतंकवाद, कभी भारत पाक, कभी कश्मीर, कभी वन्दे मातरम, कभी क्रिकेट विश्व कप, कभी राष्ट्रपति चुनाव, कभी जी एस टी, कभी भारत चीन समस्या.... तो कभी कुछ और हैं...
खिलाने वाला कम्प्यूटर और कोई नहीं..हमारी सरकार है...जीतना उसी को है..आपके मन बहलाने के लिए कभी कभी आप जीते का भ्रम पैदा करती रहती है बस!!
और खेलने वाले आप...सारे दुख दर्द भूल कर कभी इस बबल को फोड़, कभी उस बबल को फोड़ में उलझे जीवन जिये जा रहे हैं..कल फिर एक नया बबल उगेगा..आज का भारत चीन समस्या का बबल फिर अनन्त में खो जायेगा..फिर कभी भविष्य में आपके जीवन के स्क्रीन पर उबरने के लिए..
और आप फिर तत्पर होंगे एक बौखलाहट की सुई लिए इस बबल को फोड़ डालने के लिए..शायद फोड़ देने का भ्रम आपके खाते में कभी आ भी जाये मगर जीत तो खिलाने वाले की ही तय है..
कबीर का कहा याद आया:
पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात
आपकी नियति उन्हें हरा कर भी हार जाना है और उनकी सियासी सोची समझी चाल.. कभी कभी हार कर जीत सुनिश्चित करना..

-समीर लाल ’समीर’ 

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शनिवार, जुलाई 15, 2017

छिद्दन बाबू कहत रह चिंता में सरकार

बताते हैं छिद्दन बाबू का नाम चिन्तन के अपभ्रंश से बना. बचपन में उनका नामकरण चिन्तन हुआ था. जथा नाम तथा काम की तर्ज पर बचपन से हर विषय पर इतना अधिक चिन्तित हो लेते कि पूरा परिवार परेशान हो उठता. ऐसे में ही एक बार बारिश को देखकर ऐसा चिन्तित हुए कि कहने लगे कि जाने कौन को ऐसी गजब गुंडई छूटी है कि पूरा आसमान छेद डाला. बचपने के इस चिन्तन की चर्चा पूरे गांव में माखौल का विषय बनी और चिन्तन बाबू को लोग छिद्दन बाबू पुकारने लगे, मगर उनकी हर विषय पर चिन्तित रहने की आदत न गई.
इसी चिन्ता चिन्ता में पढ़ लिख तो अधिक न पाये मगर दखल हर विषय में देने लगे. प्रभु की कृपा से वाणी भी ओज़ भरी पाई तो कालान्तर में जब किसी विषय पर चिन्तित होकर अपनी चिन्ता प्रकट करते और उसका हल सुझाने का दावा करते तो लोग उन्हें मगन होकर सुनते.
सुबह से लेकर शाम तक वह चौराहे पर चौरसिया जी की पान की दुकान के बाहर बैंच पर बैठे पर चिन्तन करते रहते और जहाँ चार पाँच सुनने वाले इक्कठे हो जाते तो अपना ओजस्वी भाषण भी दे डालते. यही उनकी दिनचर्या रही है.
छिद्दन बाबू का तकिया कलाम रहता कि अरे ससुरे, हमसे तो पूछ लेते एक बार..हम बताते न उनको समस्या का हल चुटकी में. बात करते हैं!!
इसी हल बताने की श्रृंखला में कभी वह नोट बंदी पर चिन्तन करते हुए पाये गये कि ये तो कोई तरीका न हुआ काला धन निकलवाने का.. अरे ससुरे, हमसे तो पूछ लेते एक बार..हम बताते न उनको, काला धन मिनटों में बाहर निकलवा देते. हम तो वो बला हैं कि काला धन तो क्या, काला नाग बिल में मिनटों में बिना बीन बजाये बाहर निकाल डालें..बात करते हैं. ऐसे में कोई अगर पूछ बैठता कि छिद्दन बाबू, अगर आपसे पूछते तो आप क्या हल बताते? छिद्दन बाबू लगभग चीखते हुए कहते कि पूछते तब की तब बताते..अब उनने अपनी मन की कर ली है तो अपनी ही करें..हमसे न पूछें..वरना तो हमारा गुस्सा जानते ही हो..इधर उनकी स्कीम और इधर हाथ में हमारा जूता..बात करते हैं!
बस, गुस्से में रिसाये बोलते रहते कि पहले पूछते तो हल बताते..अब जाओ अपने मन की ही करो!! मगर कभी हल न बताते..
उनके जानने वालों को बस उस दिन का इन्तजार है जब कोई किसी बात के हल पर अपना तरीका न आजमाकर पहले छिद्दन बाबू से हल मांगने आ जाये और लोग देखें कि कैसे छिद्दन बाबू ने चुटकी बजाते ही हल कर दी समस्या. मगर यह भी काला धन निकल आने की तरह ही शास्वत इन्तजार का विषय ही बना रहा गया है अब तक तो.
आज छिद्दन बाबू भारत चीन समस्या को लेकर चिन्तित दिखे. कहने लगे ये तो हमेशा की समस्या रही है फिर आज क्यूँ कूद कर सामने आ रही है. वैसे भी इसका हल तो चुटकी में निकाल सकता हूँ मगर ससुरे हमसे पूछे तब न.. करने दो उन्हें उनके मन की.
अभी पहले का चिन्तन का कोई हल निकल न पाता इसके पहले एक नई समस्या की चिन्ता की आँधी पुरानी चिन्ता को अपने गुबार के नीचे दबा डालती. लोग उनके नये ओजस्वी भाषण सुनने लगते और पुरानी समस्या भूल जाते..ऐसा लगता कि वो समस्यायें अब न रही और बस, एक ही समस्या बच रही है कि भारत चीन न भिड़ जायें आपस में...
गहराई से सोचें तो यह मात्र छिद्दन बाबू की चिन्ता के साथ नहीं है ..पूरा देश इसी लपेटे में हिचकोले खाते हुए जिये जा रहा है...और हमारे रहनुमा इस बात से भली भाँति परिचित हैं कि आज की समस्या को हल करने के लिए कल बस एक नई समस्या ही तो चाहिये..जनता का क्या है वो उसके हल के लिए बिलबिलाने लगेगी..
यही नियति है जनता की और यही तरीका भी इतने बड़े देश को चलाने का...
भारत चीन के आगे कई जहाँ और भी हैं..आगे आगे देखिये होता है क्या!!
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई १६, २०१७ अंक में प्रकाशित
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