शनिवार, मार्च 25, 2017

गरमी की गरमाहट


गरमी का मौसम तो बस चार महिने में निकल लेता है फिर अगले बरस ही लौट कर आता है. इससे क्या डरना और क्या परवाह करना. मानव मष्तिक अति खुराफाती होता है, इसने इसको तो चकमा देना सीख ही लिया है. जिससे जो बन पड़ता है वो अखबार से पंखा झलने से लेकर एसी में सारा समय गुजार राहत पा ही लेता है.
साधन सम्पन्न लोग इसे छुट्टी का मौसम मान कर ठंड़े पहाड़ों से लेकर ठंड़े विदेशी शहरों में समय बिता आते हैं.
साधन सम्पन्न होने के लिए भी पैसों की या पावर की गरमी चाहिये. यूँ भी पैसों की और पावर की गरमी की आपसी संगाबीत्ती तो जग जाहिर है ही. मगर ये गरमी इतने आसानी से नहीं जाती. इस गरमी के भोगी इस गरमी से निकलना ही नहीं चाहते. उनके मोह मोह के धागे रेशमी होते हैं – टूटे नहीं टूटते.
पावर की गरमी बचाये रखने के लिए दल बदल से लेकर घर बदल तक से उन्हें गुरेज नहीं रहता. इन्हीं को देख कर एक शायर ने कहा है कि जैसे आग और पानी का कोई साथ नहीं वैसे ही पावर और शरम का कोई साथ नहीं. कब किसका हाथ थाम लें और कब किसको गले लगा लें, कौन जाने!! पावर न जाये भले ही बाप और चाचा को गाली बकना पड़ जाये.
दूसरी तरफ पैसे की गरमी. वो भी जो न करा जाये..इस गरमी को गले से चिपकाये इन्सान का मद और अहंकार उस मुकाम पर पहुँच जाता है जहाँ वो सोचने लगता है कि मैं तो दुनिया में कुछ भी खरीद सकता हूँ. फिर वो कानून हो, देश हो या देश की सरकार. मगर ये पैसे की गरमी भी जब एक दिन उतरने लगती है तब या तो लंदन भाग जाना याद आता है वरना तिहाड़ निवास बन जाता है.
एक गरमी और भी होती है जिसे जवानी की गरमी कहते है. वो भी उतरते उतरते ही उतरती है और कईयों की ८८ साल की उमर में भी नहीं उतरती. इस गरमी से बौराये लोगों को हिन्दी साहित्य में दीवाना कहा गया है और सरकारी भाषा में रोमियो.
आजकल एक प्रदेश विशेष में इस रोमियोयी गरमी को उतारने के वैसे ही विशेष प्रबंध किये गये हैं जैसे मौसम की गरमी उतारने के लिए जगह जगह सरकारी ठंड़े पीने के पानी की व्यवस्था की जाती है. अतः ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में यह गरमी कंट्रोल में रहेगी. वो शायद ये भूल रहे हैं कि सरकारी ठंड़े पानी की मशीनें लगाई तो जरुर जाती है मगर वो चलती भी हों और उनसे ठंडा पानी भी आता हो, ऐसा अजूबा कब देखने में आता है?
वैसे तो हम बताने निकलें तो पूरा गरमी का मौसम बीत जाये तरह तरह की गरमियाँ बताते बताते मगर जनहित में बता नहीं रहे हैं कि हर गरमी के लिए कहीं एक एक नया कानून न चला आये उस गरमी को उतारने के लिए..
बेहतर हो कि गरमी के मौसम की गरमी उतारने पर सरकार ध्यान दे ताकि कोई लू से न मरे और कोई किसान सूखे से परेशान होकर आत्म हत्या न कर ले.
हर घर बिजली, हर घर पानी...का नारा बुलंद हो तो बात बनें!!
-समीर लाल ’समीर’   
#Jugalbandi #जुगलबन्दी
   

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गुरुवार, मार्च 23, 2017

जागो, हथेली के बाहर एक दुनिया और भी है!!!


यह घनघोर आत्म मुग्धता का युग है. जिसे देखो, जहाँ देखो सेल्फी खींच रहा है और उसे फारवर्ड करके पहले से बंटा बंटाया ज्ञान ऐसे बांट रहा है मानो अगर वो अपनी सेल्फी ताजमहल के सामने खड़े होकर न लेता और फारवर्ड करके न बताता तो विश्व जान ही नहीं पाता कि ताजमहल विश्व के सात आश्चर्यों में से एक है. आत्म मुग्धता की इससे बड़ी और क्या मिसाल होगी कि बाजार भी इसे भुनाना सीख गया है और जगह जगह फोटोग्राफर बोर्ड लगा कर बैठे हैं कि हमारे यहाँ सेल्फी खींची जाती है.
हालात ये हैं कि एक मोबाईल के माध्यम से सारी दुनिया अपनी हथेली में उठाये अपने आपको विश्व गुरु कोचिंग सेन्टर का प्रधानाध्यापक घोषित करने में हर व्यक्ति जुटा है. जाने कौन इनको बता गया है कि आने वाले समय में भारत विश्व गुरु होगा. याने सारी दुनिया भारत से ट्य़ूशन पढ़ेगी. कोई से भी मास्साब की क्लास खाली न रह जाये इसलिए बिना पूछे सभी ज्ञान बांटने में लगे हैं. एक सफल केन्डीडेट की सफलता का श्रेय सारे के सारे मास्साब लिए जा रहे हैं कि इसे व्हाटसएप पर हमने ही दिया था यह ज्ञान. जैसे आई आई टी और जे ए ई की टॉप मेरिट में आने वाले सब कोचिंग सेन्टर के बोर्ड पर अपनी फोटो के साथ विराजमान रहते हैं कि बस यही हैं जिनकी वजह से हम आई आई टी में हैं. यहाँ तक कि जिसे खुद नहीं पता था कि कोई योगी से कभी मुख्य मंत्री बन जायेगा, उसके लिए ये दावा करने वालों की तादाद कि हमने तो पहले ही बताया था बीजेपी को मिले कुल मतों से अधिक निकल रही है और दावों का आना मय सेल्फी अभी भी जारी है.
किसी घटना स्थल पर वारदात को रोकने में साहयता पहुँचाने की बजाय वारदात को अपनी सेल्फी के संग दिखाने की होड़ लगी है. सबसे पहले कैसे अपने चाहने वालों को बता दूँ कि अगर मैं न होता तो तुम इस घटना के बारे में जान भी न पाते,
पहले जो लोग हथेली में अपना भविष्य बांचने के लिए ताका करते थे आज वो अपनी हथेली में विराजमान मोबाईल से दुनिया का भविष्य बांच रहे हैं.
इन्सान इस कदर मोबाईल में खो गया है कि जब सामने की बिल्ड़िंग में रहने वाला मित्र अपना स्टेटस अपटेड करता है कि क्या गजब नजारा है..सामने वाली बिल्ड़िंग में भीषण आग...और साथ में अपनी खिड़की से खुद की सेल्फी बैकग्राऊन्ड में आग में लिपटी बिल्ड़िंग के साथ लगाता है..तब उसे लाईक कर कमेंन्ट में वॉव!! गजब का नजारा...लिख देने के बाद ख्याल आता है कि अरे, यह तो मेरी ही बिल्ड़िग है. और तब तक बाहर निकलने की लॉबी का रास्ता भी बंद पाकर... खिड़की की तरफ भागते हुए भी एक स्टेटस अपडेट...फीलिंग स्केयर्ड..कान्ट स्केप...(बहुत डर गया हूँ, बचने का कोई रास्ता नहीं) और साथ में अपने डरे चेहरे की सेल्फी..
इस अजब सी हो चली आत्म मुग्ध दुनिया से ज्यादा तो क्या कहें ...बस इतना कहना है कि अगर किसी सुबह उठ कर जब तुम आईने में देखो और तुम्हें अपने चेहरे को घेरे हुए एक आभा मण्डल सा दिखाई दे ( अंग्रेजी में ऑरा ) तो स्वयं को दिव्य पुरुष मानकर सेल्फी खींचने और दोस्तों को भेजने की गल्ती करने की बजाय चुपचाप आँख के डॉक्टर के पास जाकर सलाह लेना, यह मोतियाबिन्द के आरंभिक लक्षण हैं.  
आभा मण्डल जैसी चीजें इस जमाने में नहीं होती..
जागो, हथेली के बाहर एक दुनिया और भी है!!!

 -समीर लाल ’समीर’
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शनिवार, मार्च 18, 2017

चुनाव के बाद..



चुनाव के बाद बस दो तरह के नेता बचते हैं. एक जीते हुए और दूसरे हारे हुए.

आज जब बड़े दुखी मन से अपने तुरंत उप्र चुनाव हारे दोस्त के घर मातम जताने पहुँचा तो वह तो उसी गर्म जोशी से मिले जैसे पहले मिलते थे. नाई चंपी करके जा रहा था. नौकर जलेबी और समोसे की प्लेट के साथ गरमा गरम चाय परोस रहा था. उन्हें देख कर लगा कि जैसे मैं चुनाव हार गया हूँ और वो मुझे ढाढस बँधाने तैयार बैठे हैं. मुस्करा कर कहने लगे कि यार, पहले सरकार चलाने और फिर इधर चुनाव के चक्कर में ही उलझे रह गये. परिवार के लिए वक्त ही नहीं मिला इसलिए कल दुबई जा रहे हैं. परिवार के साथ छुट्टी मनाने १० दिनों के लिए. थोड़ा आराम भी तो जरुरी है.

हम तो गये ही यह पूछने थे कि चुनाव हारने के बाद अब क्या प्लान है? क्या कोई नया धंधा वगैरह तलाशेंगे? घर परिवर चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा? चुनाव में जब चंदा मांग रहे थे तभी हमें लग गया था कि बंदा अपनी पूँजी चुक गया है,,वरना किसी से मांगने की क्या जरुरत? चुनाव में उनके द्वारा उड़ाई रकम देख कर लगा था सारी की सारी पूँजी भी खर्च कर ही दी होगी. मगर आज उनका हाल देखकर तो लगा कि चुनाव हार कर मानो लाटरी लग गई हो. बंदा सपरिवार दुबई जा रहा है छुट्टी मनाने. हम तो विभाग से एलटीसी मिलने के बावजूद भी मात्र आगरा, जयपुर और नैनीताल घूम पाये हैं छुट्टी मनाने.

अब गये थे तो पूछना भी जरुरी था कि भाई साहब, लौट कर क्या सोचा है, क्या करना है?

कहने लगे कि करना क्या है? अगले चुनाव की तैयारी करनी है..वाईफ को सत्तारुढ पार्टी ज्वाईन कराना है. बस और क्या!!

इस बार जरा सा चूक गये एक दो साथियों को पहचानने में. अगली बार तो हम ही जीत रहे हैं..ग्राऊण्ड रिपोर्ट है हमारे पास...चाहो तो शर्त लगा लो. ये जो जीते हैं न...इनकी कोई औकात थोड़े न है..वो तो हमारे अपने साथी सेबोटाज़ न करते तो इनकी जमानत जब्त हो जाती. बाप बेटे की लड़ाई के चलते हमारे शहर में अपने ही विद्रोही हो लिए.

हमने कहा चाहे जैसे भी जीते हों मगर उन्होंने तो आपको और आपकी पार्टी को सिरे से साफ कर दिया. वे हँसने लगे – बोले, तुम्हें राजनीति की समझ नहीं है. यहाँ न तो कोई सिरा होता है न ही कोई छोर, जो कोई किसी को सिरे से खत्म करे और न ही चुनाव के बाद क्या होगा जैसी कोई सोच....जो भी ऐसी सोच रखता है वो नेता हो ही नहीं सकता..

अगर नेता हो तो चुनाव में हारो या जीतो..नजर अगले चुनाव पर ही होना चाहिये. जो बीत गई वो बात गई.

और हमारी या आपकी पार्टी जैसी अवधारणा भी मूर्ख ही पालते हैं. नेता अजर अमर है. नेता मूल रुप से राजनिती की आत्मा है और पार्टी शरीर. पार्टियाँ बदलती रहती हैं.

इनकी बात सुन कर मुझे याद आया कि कभी हमारे गुरु जी ने न जाने किस संदर्भ में उदाहरण दिया था कि जरायम पेशा लोगों से यह पूछना जेल से लौट कर क्या करने का इरादा है? वो भला क्या यह बतायेगा कि लौट कर साधु हो जाऊँगा? उसका तो सीधा सादा एक जबाब होगा कि अगला असामी देखूँगा कि किसको निशाना बनाना है. पकड़ा गया तो एक बार फिर जेल यात्रा. ये तो सतत प्रक्रिया है हमारे पेशे की. विचार किया तो पाया कि दोनों पेशों के बीच है भी तो बहुत झीनी सी लकीर, जिसके इस पार उस पार आना जाना भी सतत प्रक्रिया ही है. मानो भारत और बंग्लादेश की सरहद हो.

एक सांस आती है. फिर एक सांस जाती है. इसके बाद सांस आने का इन्तजार छोड़ दें क्या? नेता जी मुस्कराते हुए समझा रहे हैं..

नेता जी की सिंगापुर की टिकिट देने के लिए बंदा आ चुका है.

क्या दुबई क्या सिंगापुर..विदेश तो विदेश है..नजर भी न गई इस ओर...

-समीर लाल ’समीर’
#जुगलबन्दी #jugalbandi
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बुधवार, मार्च 15, 2017

फेस बुकिया कैसे कैसे


कई लोग फेस बुक पर इस तरह लाईक करते नजर आते हैं मानो कोई नेता रोड़ शो में सबका हाथ हिला हिला कर अभिवादन कर रहा हो. देखा पहचाना किसी को नहीं, हाथ हिलाया सबको. इनका संघर्ष मात्र इतना सा है कि आप देख लो कि यह सक्रिय हैं और आपको पसंद करते हैं.
एक सज्जन है उनके बारे में दावे से कह सकता हूँ कि या तो वो कोई टू डू टास्क टाईप की लिस्ट मेन्टेन करते हैं कि किस दिन किस की वाल पर जाना है या फिर तोते से नाम की पर्चियाँ कढ़वाते हैं, तोता जिनके नाम निकाल दे, उन्हीं के वाल पर निकल लिये और धड़धड़ाते हुए सबसे नई पोस्ट से लेकर पिछली बार की लाईक की आखिरी पोस्ट तक लाईक करते चले गये.७ मिनट में १७ आलेख वो भी ५००-५०० शब्दों वाले लाईक किये और ये चले. इनका नाम लिमका बुक में फास्टेस्ट रीडिंग में दर्ज होना चाहिये.
उनकी बेइन्तहा लाईक देखकर कई बार लगने लगता है कि सही उम्र के मोड़ पर मिले होते तो मोहब्बत हो गई होती. इतना भी भला कोई किसी को चाहता है क्या?
इनसे उपर की पायदान पर वे फेसबुकिया बैठे हैं जिनकी वाल आपके भरोसे चलती है. वे मात्र शेयर में भरोसा रखते हैं. जो पोस्ट दिखी, बस शेयर. आपको भी अच्छा लगता है कि उनको इतना अच्छा लगा कि शेयर किया है अपने चहेतों के बीच और जाकर देखिये तो शेयर पर एक भी लाईक नहीं. इनकी वाल लदी रहती है शेयर्ड पोस्टों से और यह निर्लिप्त भाव से उस बोझ को बढ़ाते चलते हैं. आपने नेताओं के साथ ऐसे समर्थक को जन प्रचार के वक्त डोर टू डोर अपने पहचान वालों के यहाँ ले जाकर मिलवाते देखा होगा जो दरवाजा खोल कर मिल तो लेते हैं, मगर उनके चेहरे के भाव साफ कहते हैं कि चलो, मिल लेते हैं मगर हमसे कोई आशा न रखना.
फिर वो दिग्गज हैं जिनकी लिए किसी ने इमोटिकॉन बनाये होंगे. वे निश्चित ही पोस्ट पढ़ कर ही इमोटिकॉन चिपकाते होंगे, वरना खुशी में नाचने वाला, चिंतन में आँख घुमाने वाला और गुस्से में लाल मूँह वाला इमोटिकॉन चिपकाना भी आसान काम नहीं. यह मात्र अपने को जमीन से जुड़ा नेता दिखाने की कोशिश मात्र है बिना टिप्पणी लिखने की मेहनत किये हुए. जैसे वो सारे राज्य सभा के सदस्य. जनता के प्रतिनिधी, जनता के प्रतिनिधियों के द्वारा चुने हुए या उनके द्वारा नामित हुए वाले.
फिर आते हैं असल ग्राऊण्ड ट्रोडन..जमीन से जुड़े नेता. पूरा कायदे से पढ़ेंगे, पढ़ कर सारगर्भित टिप्पणी करेंगे और अपने द्वार पधारने का निमंत्रण भी देंगे. सुधार के सुझाव भी छोड़ जायेंगे. नमन है इनको निश्चित ही मगर इनकी आड़ में कई लिख कर दिखने जैसा कट पेस्ट लगाने वाले कि बहुत खूब, उम्दा, सतीक, बेहतरीन...आदि वो लोग हैं जो मात्र इस लिए चुनाव जीत जाते हैं कि फलानी पार्टी के हैं और उस पार्टी की लहर क्या सुनामी चल रही है..इनसे सतर्क रहना चाहिये थोड़ा सा..बहुत नहीं.
कुछ तो अध्यात्म के उस अंतिम मुकाम पर पहुँचे पीर हैं जो हर घटित होने वाली घटना को मात्र साक्षी भाव से निहारते रहते हैं. वे फेसबुक पर होते हुए भी नहीं हैं. देखते सब कुछ हैं मगर बस साक्षी भाव से. न लाईक करते हैं न कमेंट और न ही शेयर. यह महामना इन सब से बहुत उपर उठ चुके हैं. कभी व्यक्तिगत तौर पर मिलो तब जान जाओगे जब ये कहेंगे कि हाँ, देखी थी तुम्हारे पोते की फोटो, बहुत प्यारा है या फिर कि काफी जगह घूम आयेहो इन छुट्टियों में...यात्रा वृतांत अच्छा था. ये फेसबुक की अनजान कुंदराओं में बैठे फेसबुकिया बाबा हैं. अक्सर किसी प्रदेश के गवर्नर या कभी कभी देश के मुखिया बनने की भरपूर गुजांइश लिए लोग.
एक और होते हैं जो टैग करते हैं, मगर हम उनके बारे मॆं कुछ नहीं कहेंगे क्यूँकि यह काम अलग अलग उद्देश्यों से किया जाता है, हर बात में राजनिती नहीं होती. बात तो हमने निर्दलियों की भी नहीं की.
ये फेसबुक है कि राजनीत का अखाड़ा...हम भी कहाँ की लेकर बैठ गये..आप तो बस कमेंट करो जी!!
-समीर लाल ’समीर’
आज मार्च १६,२०१७ के भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में

http://epaper.subahsavere.news/c/17556138
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