शनिवार, जनवरी 20, 2018

बसंत के आगमन की तैयारी और विकास की प्रतीक्षा

बसंत मुहाने पर है. बसंत कोई विकास नहीं है, यह अच्छा बंदा है. कहता है तो आता है. आता है दिखता है. दिखता है तो इतना मनोहारी और सुहाना होता है कि मन खिल उठता है. धरती महक उठती है. बाबा बेलेन्टाईन धंधे से लग लेते हैं. उनके लिए ये मौसम वैसा ही है जैसे घोड़ी के लिए शादी का सीज़न. बाकी समय तो कोई पूछता ही नहीं. मगर शादी के समय धंधे का ये हाल, कि एक ही टाईम के लिए पांच पांच बुकिंग. मूँह मांगी कीमत लो. एक ही शाम में पांच पांच बारात लगवा कर ही थोड़ा आराम मिलता है. १४ दिसम्बर से १४ जनवरी तक देवताओं का सोना, जब हिन्दुओं में शादियाँ नहीं की जाती हैं, शादी के लिए इन्तजार कर रहे जोड़ों से ज्यादा घोड़ियों को अखरता होगा. मुझे उनकी भाषा नहीं आती वरना उनसे पुछवा कर सिद्ध कर देता कि मैं सही हूँ.
खैर, आती तो मुझे विकास की भी भाषा नहीं है वरना उससे पुछवा कर भी साबित कर देता कि उसका कोई प्लान नहीं है अभी आने का. प्लान तो छोड़ो, न्यौता तक नहीं मिला है. वो अमरीका में रहता है. न्यौता मिलेगा तो छुट्टी अप्लाई करेगा. फिर वीसा मिले न मिले? उस पर से ऑफ सीजन में टिकिट सस्ती होती है और न्यौता फुल सीजन का..उतने पैसे हों न हों..बुलाने वाले की तरह फकीर भी तो नहीं हैं कि झोला उठाया और चल दिये. बीबी से पूछना होगा, बच्चों की सोचना होगा, तब निकल पायेगा..एक लम्बा समय लगता है प्लानिंग में किसी को विदेश से देश जाने में.. और वो बिना न्यौता भेजे चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं..वो देखो, विकास आ रहा है? कोई देश से विदेश तो जाना नहीं है कि हवाई जहाज उठाया और चल दिये, साथ ही रास्ते में शादी और अटेंड कर ली..
बसंत का माहौल जबरदस्त मन मस्त कर देने वाला होता है. एकदम रंग बिरंगा. कवि कविता गढ़ने लगते हैं और प्रेमी प्रीत के सागर में गोते लगाने लगते हैं. हमारा एक घर होगा..हम तुम ..बस और कोई नहीं. हमारे छोटे छोटे बच्चे होंगे..अब इनसे कोई पूछे कि तुम्हीं नोखे के हो क्या भाई? ऐसी क्या बहादुरी बतिया रहे हो..बच्चे तो सभी के छोटे छोटे होते हैं..बाद में बड़े होते हैं. तब वह झल्ला गये, कहने लगे ..देश में आज भी देख लिजिये जाकर उनको..५० के होने को आये मगर अभी भी छोटे बच्चे ही हैं. लोग बता रहे हैं कि जल्दी जल्दी सीख रहे हैं. पिरधान जी बनेंगे आगे.
बसंत को इन्हीं गुणों के कारण ऋतुओं का राजा कहा गया होगा. मैं बसंत को राजा ही नहीं बल्कि राजा साहेब मानता हूँ. साहेब लग जाने से पोजीशन में जान आ जाती है. वरना तो इंजीनियर भी मैकेनिक नजर आये. मात्र राजा कह देने से कभी- का हो बाबू, रज्जा बनारसी!! का भी भ्रम हो सकता है. दुनिया बदली है अतः आपको भी इसी तरह अपनी सोच बदलना होगी. तो राजा साहेब की याद आते ही आजकल के बदले लोकतंत्र की याद आती है. राजे रजवाड़े खत्म करके लोकतंत्र बनाया गया था. जनता की सरकार, जनता के द्वारा, जनता के लिए. आजकल सरकार की जगह राजा साहेब बन रहे हैं. जनता के राजा साहेब, जनता के द्वारा, जनता की ऐसी तैसी करने के लिए.
बसंत को तो मानो कि वो चुनावी घोषणा पत्र है अंग्रेजी में एलेक्शन मेनीफेस्टो... जो मनभावना तस्वीरें दिखाता है. छोटे छोटे बच्चों की आस लगाये लोगों को बड़ा सा विकास लाकर देने की बात करता है. हर तरफ वादों की ऐसी हरी भरी वादी सजाता है कि बेरुखे से बेरुखे दिल वाला गीत गा उठे, कवित्त रचने लगे. ऐसा कह कर मैं कविता को ऐरा गैरा नहीं ठहरा रहा हूँ मगर जैसा कि मैने पहले कहा कि जमाना बदला है तो हमें बदलना होगा. अब प्रेम कविता रचने के बसंत की दरकार नहीं है. जरुरी है कि आपका एक फेसबुक का पन्ना हो और उस पर जाकर कबूतर बोला गुटर गू.. तुम सुनना आई लव यू...लिख आयें, लोग उसे स्वयं प्रेम कविता का दर्जा दे लेंगे. दिया ही है न इसीलिए.. ईमानदार और जनहित की पैरोकार सरकार का दर्जा. अपनो से चार लाईक ही तो चटकवाने हैं.
बसंत की चकाचौंध में अंधियाये आज हम ऐसा राजा चुनने के आदी हो गये हैं जिसे हम छू भी नहीं सकते. वो हमारे बीच ज़ेड सिक्यूरिटी में आता है, मानो कि हम ही उसके लिए सबसे बड़ा खतरा हों. वो हमसे बात नहीं करता, वो बात कहता है. फरमान जारी करता है. ताली बजा बजा कर अपनी ही प्रजा का मजाक उड़ाता है. खुद को फकीर बताता है और दिन में पांच बार डिजाईनर पोषाक बदलता है. ताजा इतिहास गवाह है कि सफल व्यक्ति जो अपने निवेशकों और चुनने वालों की चिंता करता है, वह कोशिश करके बेवजह के डिसिजन को दूर रहता हैं..चाहे एप्पल का स्टीव जाब्स हो, फेसबुक का जुकरबर्ग, अमरीका का ओबामा, भारत के गांधी..रोज एक ही पोषाक पहनते थे..भले उनकी तादाद कुछ भी हो...मगर उन्हें इस बात पर समय कभी खराब नहीं करना पड़ता था कि अब कौन सी पोषाक पहनूँ?
सही ही है कि बसंत के बाद चिलचिलाता ग्रीष्म का मौसम जला कर रख देता है वो सारे सपने, वो सारे कवित्त, वो सारी हरियाली, वो सारे प्रीत के हिचकोले जो बह जाते हैं जीवन की हकीकत से जूझते हुए पसीने में..दिवा स्वप्नों की इतनी सी ही उम्र है और मगर हम!!!!
हम उन बसंत रुपी चुनावी प्रलोभनों वाले दिवा स्वपनों के साकार होने का इन्तजार कर रहे हैं.
जमाना बदला है तो शायद कभी बबूल का पेड़ बोने पर भी आम आ जायें!!
एक उम्मीद ही तो है.
-समीर लाल समीर’     
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में २१ जनवरी,२०१८ के अंक में:


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शनिवार, जनवरी 13, 2018

लेखक उम्रदराज व्यंग्यकार हैं..

पुस्तक मेला सजा हुआ है दिल्ली में. लेखक, कवि, कहानीकार, साहित्यकार, व्यंग्यकार और तमाम इन विधाओं के वरिष्ठ इसमें शिरकत कर रहे हैं. उत्सवधर्मी देश में उत्सव का अलग महत्व है, उसे नकारा नहीं जा सकता. इनमें सबके अपने परिचय हैं. कोई मात्र लेखक है, तो कोई वरिष्ठ और कई इसलिए नाम जमाये हैं क्यूंकि वह किसी वरिष्ठ के घनिष्ट हैं,
हमें खुद..जमाना गुजर गया लिखते लिखते. लिखने का तरीका बदल गया है. लेखक की तस्वीर बदल गई है. लेखक के चेहरे का क्षेत्रफल बदल गया है बालों के उड़ जाने से...लेखक की फैन फॉलोईंग के अंक बदल के १०० गुणित हो लिए हैं और अखबार वाले हैं कि संज्ञान में कोई बात लेते ही नहीं. पहले भी हर आलेख के साथ परिचय लिखते थे कि लेखक कनाडा निवासी व्यंग्यकार हैं और आज भी यही लिखते हैं. शुरुवाती दौर में तो लगता था कि कनाडा निवासी शायद इसलिए लिख देते होंगे कि यदि इनका व्यंग्य..व्यंग्य जैसा न लगे तो इनको जरा छूट दे देना क्यूँकि यह भारत निवासी नहीं हैं अतः शायद जानकारी अधूरी हो..हिन्दी खराब हो..तथ्य को तोड़ना मरोड़ना न जानते हों. मगर वो भूल जाते थे कि इस कनाडा निवासी का डी एन ए भी तो भारतीय ही है और उससे भी ज्यादा, उस जबलपुर की  आबो हवा में पनपा है जिसमें परसाई की खुशबू थी...उनका आशीर्वाद था...उनका द्वारा प्रद्दत बचपन का पुरुस्कार था. कनाडा, आस्ट्रेलिया, भारत..क्या  फरक पड़ता है..व्यंग्यकार तो व्यंग्यकार ही होता है. अगर व्यंग्य लिखा है तो लिखने वाला व्यंग्यकार ही होगा.
इस बात पर हमारी चुप्पी शुरुवाती दौर में इसलिए भी रही कि इससे हमें ही माईलेज मिल रही थी..लोग कहा करते थे और आज भी लोग कहा करते हैं कि आप देश से इतनी दूर रह कर भी देश के हालातों पर यूं सहजता से लिखते हैं कि लगता है जैसे यहीं बैठे अहसास रहे हों. मैं सोचता हूँ कि शायद भारत में बैठकर लिख रहा होता तो कोई नोटिस भी न करता.. सही सोच रहा हूँ या गलत नहीं मालूम. मगर विदेश का जलवा भी तो नकारा नहीं जा सकता. राहुल गांधी के गुजरात चुनाव के दौरान बदले तेवरों और बेहतर प्रदर्शन के पीछे उनकी बर्कले यूनिवर्सिटी में हुई सफल कांफ्रेंस का हाथ बताया जा रहा था । इसीलिए शायद वे अगले चुनावों से पहले बहरीन गए हुए हैंऐसे में वो देश में सरकार की सांस फुलवाने में कसर नहीं छोड़ रहे. आगे भी बहुत सी विदेश यात्रायें उनके अजेंडॆ पर हैं. चुनाव देश में लड़ना है मगर प्रचार विदेश में रह रहे एन आर आई के बीच जिनको तो वोट भी नहीं देना है. मगर सभी पार्टियों के शीर्षस्थ यही करते हैं चाहे आप हो, कांग्रेस हो या भाजपा. ऎडीसन स्क्वायर का मजमा आज भी ओग याद करते हैं और जो नहीं करते, उनको याद कराया जाता है. अधिकतर देशी कवि और साहित्यकार भी विदेश यात्रा कर के अपने बायोडाटा को संपूर्ण सिद्ध करते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है. इससे देश में कीमत बढ़ जाती है..यह तय है. ऐसे में जब आप विदेश में ही रह रहे हो तो भुना लेने में क्या बुराई है?
मगर फिर यही लेखन जब थोड़ा स्थापित हो जाता है तो विदेश में बैठा ये लेखक ही, जिसे प्रवासी होने की वजह से ही नोटिस किया गया था..प्रश्न उठाता है कि हमारे लिखे को प्रवासी साहित्य क्यूँ पुकार रहे हो?..साहित्य तो बस  साहित्य होता है..हमें भी मुख्यधारा का साहित्यकार मानो. हालांकि वो खुद भी जानता है अगर ऐसा हो गया..तो दो चार को छोड़ कर बाकियों की कौड़ी भर की औकात न रह जायेगी. भारत में गली गली उनसे बेहतर लिखने वाले बैठे हैं..जिन्हें कोई पहचान नहीं रहा है.
खैर मेरी चिन्ता दीगर है..मुझे एक जमाने से कनाडा निवासी व्यंग्यकार लिखा जाता रहा है अखबारों और पत्रिकाओं में. मेरे बहुत से परिचित भारत में रह कर व्यंग्य एव व्यंग्यनुमा कुछ लिख रहे हैं और आजकल अखबार उनको लेखक वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं लिख रहा है. ये कैसे हुआ?..इसके लिए क्या डीग्री चाहिये? हम भी एक लम्बे समय से पत्र पत्रिकाओं में छप रहे हैं..हम क्यूँ नहीं कनाडा निवासी वरिष्ठ व्यंग्यकार कहलाये? हमारा प्रमोशन क्यूँ रुका है? कोई कोटा तो नहीं है लोकल रिजर्वड जो हमको मालूम ही न हो?
अखबार वालों से पूछा कि यह भेदभाव क्यूँ कर हो भई? वो बोले कि सर!! आप तो अभी जवान हैं...युवा हो.. यह टाईटल तो वृद्धों के लिए है..आप कहाँ लग गये इस चक्कर में? मन को तसल्ली मिली और हम चुप हो लिए..लगा कि आगे से वो हमारे लिए लिखें कि ’लेखक कनाडा निवासी युवा व्यंग्यकार हैं.’
मगर अगले दिन जब सुबह का अखबार उठाया तो एक समाचार पर नजर पड़ी...बस स्टैंड के बाहर एक वृद्ध की ठंड से ठिठुर कर मौत,,,वृद्ध की शिनाख्त चिरई ढ़ोंगरी निवासी घंसु पटेल, उम्र ५३ वर्ष हुई है.
समाचार पढ़कर हम ठिठुर गये कि अगर ५३ वर्षीय वो मृत वृद्ध है तो हम क्या हैं? वयोवृद्ध कि कब्र में बैठे लिख रहे हैं? मर जायें तो वृद्ध और वरिष्ठ व्यंग्यकार लिखवाना हो तो युवा? अजब हो तुम अखबार वाले..
हद है डिसक्रिमिनेशन की...हमको बहलाने के लिए स्टैंड लेते हो..हमने पूछा तो कहते हैं कि वो बुढ़ा गरीब था..वरना तो हमारे यहाँ राजनिति में ६५ साल के युवा टहल रहे हैं पूरी एनर्जी के साथ ..छाती फैला फैला कर ओजस्वी भाषण दे रहे हैं..आये दिन विदेश घूम रहे हैं..और आप भी तो विदेश में रहते हो..डालर में कमाते हो..जिम जाते हो..आये दिन जाम छलकाते हुए तस्वीर सटाते हो.. समरथ को नहीं दोष गुसांई...तुलसीदास तक कह गये तो हम तो अखबार वाले हैं. अब ऐसे में क्या कहते..अतः तब चुप रह गये..
मगर अब मैने भी तय कर लिया है कि इनके झांसे में नहीं आना है और अगली बार आलेख दूँगा ही तब.. जब ये तैयार हो जायेंगे मेरे नाम के साथ यह लिखने को कि लेखक कनाडा निवासी वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं
कौन जाने इसी चक्कर में कितने सम्मान लटक गये हों..कि जब बंदा वरिष्ठ है ही नहीं तो सम्मान कैसा देना? एक अटकल ही तो है.
-समीर लाल समीर

दैनिक सुबह सवेरे भोपाल के रविवार १३ जनवरी, २०१८ कें अंक में:


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