शनिवार, अप्रैल 21, 2018

सब को फुकरा बना कर छोडुँगा!!


एटीएम में नोट नहीं,
अगली बार वोट नहीं.
हमेशा की तरह राष्ट्रीय चिंतन हेतु तिवारी जी सुबह सुबह नुक्कड़ की पान की दुकान पर आ चुके हैं और यही नारा लगा रहे हैं. हमेशा की तरह आज भी वह भड़के हुए हैं कि चलो, १५ लाख न दिये तो न सही. वो तो हमें लग ही रहा था कि वोट के चक्कर में फेंक रहे हैं. उसका तो हम इनसे अगली बार हिसाब मांगेंगे. आने दो दरवाजे पर. मगर हमारा पैसा, हमारा खाता और एटीएम से कुछ निकल ही नहीं रहा है. कैशलेस इकनॉमी की बात करते करते ये तो कैशलेस एटीएम टिका गये. मुहावरा बदल दिया है इन सबने मिलकर. आज इन्सान दर दर की जगह एटीएम एटीएम भटकते रहे, कहता है.
वे कहने लगे कि इनके चलते आज हमारी हालत नन्दू के समान हो गई है. उसके तो खाते में पैसे होते नहीं हैं और उधारी सर तक चढ़ी है. जब कोई अपनी उधारी वापस मांगता है, तब उसे तो मस्त बहाना मिला हुआ है. सबसे कह देता है कि बस!! जैसे ही एटीएम में कैश आयेगा, निकाल कर दे दूँगा. देनदार भी क्या कहे, उसे भी पता है कि एटीएम में पैसा ही नही है. कल हमको दूध वाले को पैसा देना था, हमने कहा कि भई, एटीएम में कैश आ जाने दो तो दे देंगे. दूधवाला कहने लगा कि क्या तिवारी जी, आप भी नन्दूबाजी पर उतर आये? बताओ, इस सरकार के चलते हमारी इज्जत दौ कौड़ी की रह गई है. वरना भला किसी की मजाल होती कि हमारा नाम नन्दू से जोड़ कर देखता.
नन्दू को तो क्या है. एटीएम में कैश हो या न हो, उसका तो कुछ निकलना नहीं है. उसके तो खाते में ही कैश नहीं है. एटीएम में जब से कैश खत्म हुआ है वो तो सरकार का अंध भक्त हो गया है. हर समय कहता फिर रहा है कि जो साठ साल में नहीं हुआ वो इस चार साल में कर दिखाया. अगली बार फिर यही सरकार. दिन भर बैठा व्हाटसएप करता रहेगा कि ६० साल में क्या नहीं हुआ. इन चार साल में क्या हुआ है वो तो कुछ बताने लायक है नहीं, तो पहले क्या नहीं हुआ..वही बखाना जाये वाली सोच में जुटा है. सारी भक्त मंडली वही कर रही है.
वैसे सोचो तो बात सही भी है, पिछले साठ सालों में कभी ऐसा मौका ही नहीं आया कि आपका पैसा और आप ही न निकाल पायें अपने बैंक से. एटीएम को आये हुए भी माशाअल्ला बरसों बीते. कभी न सुनते थे कि शहर भर के एटीएम खाली हो गये.
शहर भर से कैरोसिन गायब होते देखा है, पैट्रोल गायब होते देखा है, शक्कर गायब होते देखी है और यहाँ तक कि ईमान भी गायब होते देखा है, नेताओं को गायब होते तो खैर हमेशा ही देखा है मगर कैश गायब हो जाये, ऐसा पहली बार हुआ है. वाह!! क्या विकास किया है? मान गये. इतिहास याद रखेगा.
तिवारी जी गुस्से में बड़बड़ा रहे हैं कि अब अगले चुनाव में वोट गायब होते हुए देखना!! समझे कमलु!
तभी किसी ने कहा कि सुना है नगर निगम चौक वाले एटीएम से कैश आ रहा है. सुन कर लगा कि कैश न हुआ मुआ पानी हो गया है कि फलां नल से आ रहा है बस.
तिवारी जी ने रिक्शा रुकवाया नगर निगम चौक जाने के लिए तो वो कहने लगा कि बाबू जी, कैश लेंगे, है न?
तिवारी जी बोले अबे कैश ही होता तो काहे जाते वहाँ? एटीएम से इश्क तो है नहीं ..कैश ही तो निकालने जा रहे हैं.
और अगर वहाँ पहुँचते तक उसमें कैश खत्म हो गया तो? रिक्शा वाला पूछ रहा है.
तो क्या, कहीं भागे तो जा रहे नहीं हैं. जब आ जायेगा कैश मशीन में, तब दे देंगे. तिवारी जी ने कहा.
रिक्शा वाला बोला..नहीं पंडित जी, हमारे साथ नन्दूबाजी न करिये..हम गरीब मानस. हमसे न हो पायेगा. हमारे पेट पर लात न मारिये.
तिवारी जी फिर नन्दू के साथ अपना नाम जोड़े जाने पर तिलमिलाये से ख़ड़े हैं.
पान की दुकान पर रेडियो पर मन की बात आ रही है: अब देश में न कोई नन्दू होगा और न कोई तिवारी..अब होगा तो बस देशवासी!! सब एक बराबर!!
याने..सब के सब फुकरे!!
-समीर लाल समीर   

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में तारीख २२ अप्रेल, २०१८ को:



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मंगलवार, अप्रैल 17, 2018

खेला उपवास का


बचपन में किन्हीं बड़े त्यौहारों पर घर में व्रत रखा जाता था. बेहतरीन फलाहारी पकवान बनते. कुट्टु के आटें की पूड़ी, काजू मूँगफली भुनी हुई सैंधा नमक के साथ, आलू की सूखी सब्जी, सिंधाड़े के आंटे का हलुआ, मखाने की खीर, साबुदाने की खिचड़ी, फ्रूट सलाद और भी न जाने क्या क्या..
जो घर में व्रत न रहते, उनके लिए रोज की तरह रोटी, सब्जी, दाल, चावल बनता. हम बालमन पकवानों की लालच में आकर व्रत रखते. कहा जाता कि एक आसना ( याने कि एक बार में बैठ कर जितना खाना हो खा लो फलाहारी, फिर नहीं मिलेगा सारा दिन). हम भी सुबह ११ बजे के आसपास फलाहारी खाकर मजे में हो लेते. मगर बच्चे थे कितना भूखे रहते आखिर?
तब मित्र सरफराज काम आता. सरफराज भाईजान के घर रावनवमीं का कैसा व्रत? वो घर से चिकन बिरयानी अपने खाने के नाम पर टिफिन में बंधवा कर तालाब के पास लेता आता और मैं उसके साथ तबीयत से बिरयानी का मजा लेता. तब तक यह हिन्दु मुस्लिम काट खाओ के बदले हिन्दु मुसलिम भाई भाई का जमाना बरकरार था.
तब तक न तो राजनिति गर्त की इतनी गहराई तक उतरी थी और न ही मित्रता में इस तरह से धोखा देने के साधन हर हाथ में थे कि सेल्फी लेकर ब्लैक मेल कर सकें. एक विश्वास बरकरार रहा था जब तक कि धोखा न हो जाये. आज अगर धोखा न हो जाये तो विश्वास करने का जोखिम उठाने को मन बड़ी मुश्किल से तैयार होता है.
सरफराज के घर पर व्रत को अलग नाम से पुकारते थे. पुकारता तो वो अम्मा और बाबू जी को भी अम्मी और अब्बू था मगर उससे मायने नहीं बदल जाते. रिश्ता तो वहीं था. व्रत को वो रोजा कहते. रोजे के वक्त वह खाना खाता मूँह अंधेरे ही और फिर उसे देर शाम इफ्तार की दावत में खाना मिलता. इस बीच खाना पीना तो दूर, थूक गिटकने की इजाजत भी न होती. तालाब पर हमारी दुपहर तब भी साथ गुजरती मगर मेरे घर की दाल चावल और बैंगन की सब्जी के साथ. वो दीवाना था मेरे घर के खाने का और मैं उसके घर के. 
बड़े हो गये तो समझदार हो गये. समझदार समझाई गई उन समझदारियों से हुए जिसमें सरफराज जैसे मित्रों की मित्रता को धर्म निर्धारित व्रत के नियमों को तोड़ने की खौफनाक साजिश बताया गया और हमारे द्वारा मित्रता के बदले लौटाये गई मित्र धर्म के कर्तव्य को लव जिहाद टाईप अपने रंग में ढाल लेने का उनका ही प्रयास बताया गया. कहीं से भी यह हमारी गल्ती न कही गई बल्कि हमारे भोलेपन का फायदा उठाते हुए एक साजिश का हिस्सा माना गया.
चलो, हम तो फलाहार के चक्कर में और सरफराज कुटाई के डर में अपनी अपने उपवास रखा करते थे मगर आजकल नेता वोट की लालच में जो उपवास रखने का उपक्रम फैला रहे है, उसमें पक्ष क्या और विपक्ष क्या, दोनों ही हमारे बचपन वाला खेल खेल रहे हैं. हम तो बच्चे थे और हमारी हरकतें वो बचपन वाली शरारतें. मगर ये तो हमारे कर्णधार, हमारे नेता हैं और अपनी मक्कारियों से हमारी ही आँख में धूल झौंक रहे हैं.  
-समीर लाल समीर 
जबलपुर से प्रकाशित पल पल इंडिया में अप्रेल १७, २०१८ को:



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शनिवार, अप्रैल 14, 2018

उपवास के उपहास में जनता का सैण्डविच


अभी कुछ दिन पहले ही जिम में था. मित्रों के साथ वर्क आऊट के बाद सोना रुम में रिलेक्स करते चर्चा का विषय था कि एक लेवल तक वजन कम होने के बाद अब कम नहीं हो रहा है. किसी ने बताया कि वजन और नेताओं के व्यवहार में यही तो अंतर है. वजन जानता है कितना गिरना है कि शरीर को फायदा पहुँचे बिना नुकसान के. नेताओं के व्यवहार के पतन की कोई सीमा नहीं. खैर, उसने बताया कि एक लेवल के बाद डाईट में अंतर लाना पड़ता है तब शरीर फिर से अपनी पकड़ छोड़ता है वजन पर.
इसी सिलसिले में किसी ने इन्टरमिटेंट फास्टिंग की बात की. इसमें आपको दिन के आठ घंटे चुनने होते हैं जैसे दोपहर १२ बजे से शाम ८ बजे तक जिसमें आप कुछ भी खा पी सकते हैं मगर फिर शाम ८ बजे से अगली दुपहर १२ बजे तक आप सिर्फ पानी या ब्लैक काफी और चाय पर रहेंगे. वजन कम करने में फायदा भी खूब करती है.
किसी ने बताया कि वे कीटोन डाईट पर है, इसमें किसी भी तरह के कार्ब से उपवास है बाकी जो मन करे, जब करे तब खाओ. मुख्य मुद्दा यह है कि हम उपवासों के तरह तरह के तरीकों की बात कर रहे हैं.
फिर पता चला कि एक उपवास तब रखा जाता है जब विपक्ष पूरे सत्र भर संसद नहीं चलने देता. इस उपवास में दोनों पक्ष उपवास की जिद कर बैठे. रोजा और उपवास का भी फर्क न रखा. कोई नियम भी न बनाये, निर्जला रखना है कि फलाहार के साथ.
दिन अलग अलग चुने गये थे बस. पहले विपक्ष ने रखा और वे उपवास पर जाने के पहले खाना खाते पकड़ा गये..फिर पक्ष ने रखा और वे उपवास के दौरान खाना खाते पकड़ा गये. एक ही दिन रखते तो अन्य बातों की तरह इस पर भी आपस में समझौता कर लेते की तू मेरी मत बताना और मैं तेरी नहीं. मगर ऐसा हो न पाया.
विपक्ष की स्थिती बेहतर बनती दिखी. वे कहने लगे कि मुस्लिम भी हमारे भाई हैं. हमने रोजा वाला उपवास रखा था और रोजे पर जाने के पहले पकवान खाना एक प्रथा है. इसमें गलत क्या है और यूँ तो हिन्दु मित्र भी हमारे साथ हैं तो अगर इसे व्रत माने तो ये फलाहारी कुट्टु के आंटे का भटूरा और आलू की बिना लहसून प्याज की सब्जी थी . यह तो होटल की तारीफ कि उसने आलू को छोले के आकार में बखुबी छोटा छोटा काटा. फलाहारी की भला कब मनाही है. विपक्ष की बात में दम है चाहे रोजा मानो तो और चाहे व्रत मानो तो. दोनों मजहब साध लिए.
पक्ष बीच दोपहर सैण्डविच खाता पकड़ाया. इसे कैसे जायज ठहराया जाये? इसकी इजाजत बीच रोजा में तो नहीं. व्रत में भी किसी भी हालत में सैण्डविच का फलाहारी होना तो कभी न सुना. और इन्टरमिटेंट फास्टिंग में तो फास्टिंग वाले विंडो में ब्लैक टी और काफी या पानी के सिवाय कुछ भी अलाऊड नहीं. 
इसीलिए कहते हैं कि आसमान में मूँह उठा कर मत थूको, खुद के मूँह पर गिरेगा.
हमेशा की तरह मूल मुद्दा कि उपवास रखने का मकसद क्या था वो जाने कहां खो गया मात्र इस हल्ले में कि किसने उपवास का कैसे उपहास उड़ाया?
आमजन फिर ठगा सा देख रहा है उसका हाल पक्ष विपक्ष के बीच में फंस कर सैण्डविच वाला हो गया है. वह सोच रहा है कि क्या यही सच नहीं कि इस उपवास के चक्कर में भी अंततः फिर वो ही उपहास का पात्र बना है.
-समीर लाल समीर 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अप्रेल १५, २०१८ को प्रकाशित:


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